Sunday, 2 December 2012

बेटियाँ पराया धन



बेटिया तो होती ही हैं धन पराया
राजा हों या रंक कोई न इसे रख पाया
बेटी -बेटे मे ये भेदभाव क्यों होता है?
बेटा अंश बढाता है, बेटी को पराया कहा जाता है
जिसको वो जानती तक नहीं,
उसी के साथ नाता जोड़ दिया जाता है
लालन -पालन और एक -सी शिक्षा -दीक्षा
फिर बेटी को ही क्यों देनी पड़ती है अग्नि -परीक्षा
जो एक पल भी नहीं होती आँखों से दूर
अचानक वो चली जाती है होकर मजबूर
कितना कठिन होता है
यूँ जिगर के टुकड़े को अपने से दूर कर देना
लाड-प्यार से पाली अपनी लाडली को
परायों के सपुर्द कर देना
माँ-बाप, भाई-बहन का प्यार छोड़कर
नए रिश्ते जोड़ लेती है पुराने तोड़कर
आँखों में
नए सपने ले चली जाती है नया संसार बसाने
बचपन की यादे भुलाकर
ससुराल के रिश्ते निभाने
बस फिर उसका ससुराल अपना हो जाता है
और मायका पराया
पति-बच्चों मे रमकर भूल जाती है
वो अपना पराया
हाय ये कैसी रीत, कोई भी इसे न जाना
किस बेदर्द ने बनाया ये दस्तूर पुराना

                     डॉ.प्रीत अरोड़ा

Thursday, 13 September 2012

हिन्दी भाषा की उन्नति के सोपान

हिन्दी भाषा सामाजिक,नैतिक ,सांस्कृतिक,व्यावहारिक मूल्यों व साहित्यिक  विचारों की धरोहर है,जिसमें से सबसे उच्च  आदर्शों  का स्तम्भ हिन्दी में साहित्य -सृजन माना जाता है I हिन्दी सदियों से ही भारत की राष्ट्रीय अस्मिता तथा जन-जीवन की अभिव्यक्तियों का मूलाधार रही है , जिसके फलस्वरूप आज हिन्दी भाषा का साहित्य अत्यंत समृद्ध व उन्नत हैI हिन्दी भाषा के पास अनेक महान साहित्यकारों का साहित्यकोष सुरक्षित है,जिनमें 'सूरदास' ,'कबीर' ,'तुलसीदास' ,'प्रेमचन्द','जयशंकर प्रसाद' ,'महादेवी वर्मा','सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला' व 'सुमित्रानन्दन पन्त' आदि महान विभूतियों ने हिन्दी -साहित्य की नींव को मजबूत करने के लिए एक भिन्न धरातल तैयार किया I इन सभी प्रतिभावान साहित्यिक मनीषियों की परम्परा को भारतीय व विदेशी पृष्ठभूमि पर आज अनेक साहित्यकारों द्वारा अपने-अपने ढ़ंग से आगे बढ़ाया जा रहा है I जब बात विदेशों में लिखे जा रहे हिन्दी साहित्य की आती है तो उसमें हमारी विश्व प्रसिद्ध वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना से ओत-प्रोत संस्कृति ,सभ्यता एवं हिन्दी भाषा के प्रति प्रेम उद्वेलित होता नजर आता है I आज विदेशी पृष्ठभूमि पर भारतीय हिन्दी साहित्य के अनेकों साहित्यकार अपने गूढ़ अध्ययन,मनन एवं चिन्तन द्वारा साहित्यनिधि को ओर भी सुदृढ़ और सशक्त कर रहें हैं I भारतीय होने के कारण जहाँ वे हिन्दी भाषा का प्रचार-प्रसार विदेशों में कर रहें हैं ,वहाँ वे भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता से भी विदेशियों को अवगत करवा रहें हैं I ये हमारे लिए गौरव की बात है कि मूलतः भारतीय लेखक विदेशों में केवल रोजी-रोटी के लिए नहीं बसे,अपितु वह तन-मन-धन से हिन्दी भाषा के विकास के लिए प्रयत्नशील हैं I
                                                पहले तो इस तथ्य पर दृष्टिपात करना होगा कि कौन-कौन से देशों में कौन-कौन से साहित्यकार हिन्दी भाषा की सेवा कर रहे हैं I विदेशी पृष्ठभूमि के अन्तर्गत अमेरिका में उषा प्रियंवदा ,ड़ॅा अनिल प्रभा कुमार,सुदर्शन प्रियदर्शिनी,सुषम बेदी ,उमेश अग्निहोत्री ,रेणु राजवंशी ,प्रतिभा सक्सेना,पुष्पा सक्सेना,कुसुम सिन्हा,नीलम जैन ,इला प्रसाद,देवी नागरानी ,वेद प्रकाश बटुक,सुधा ओम ढ़ीगरा ,सौमित्र सक्सेना,युवा लेखिका रचना श्रीवास्तव व अन्य आदि ,ब्रिटेन में गौतम सचदेव,अचला शर्मा,पद्मेश गुप्त,जकिया जुबैरी,उषा राजे सक्सेना,तेजेन्द्र शर्मा,उषा वर्मा ,प्राण शर्मा,दिव्या माथुर ,शैल अग्रवाल,जया वर्मा व कई और ,कनाडा में सुमन कुमार घई,ड़ॅा शैलजा सक्सेना, समीर लाल समीर,मारीशस से अभिमन्यु अनन्त ,ड़ेनमार्क में चाँद शुक्ला हदियाबादी,अर्चना पैन्यूली व अरब इमारात में पूर्णिमा वर्मन ,कृष्ण बिहारी आदि साहित्यकारों के नाम उल्लेखनीय हैं I
                            ये सभी साहित्यकार अपनी मानसिक अनुभूति,जीवन-दृष्टि,यथार्थ के प्रति बौद्धिक तथा भावनात्मक- चेतना को लेकर न केवल कविताएँ,गजल,कहानी ,लघुकथा,उपन्यास,संस्मरण व आलेख आदि लिखकर भारतीय हिन्दी साहित्य को एक नई पहचान दे रहें हैं,अपितु इसके साथ-साथ अध्यापन,पत्र-पत्रिकाओं के संचालन,विश्व-हिन्दी सम्मेलनों व गोष्ठियों आदि के आयोजन करके विदेशियों को अपनी भाषायी अस्मिता  से भी रू-ब-रूह करवा रहें हैं I सभी साहित्यकार साहित्य लेखन में हिन्दी की दशा व दिशा,जनमानस की मूलभूत समस्याओं ,जीवन संघर्ष की अभिव्यक्ति व सामाजिक मुद्दों आदि पर लेखन कर रहें हैं I ब्रिटेन की लेखिका "उषा राजे सक्सेना " अपनी पुस्तक "ब्रिटेन में हिन्दी" में दिए गए विषयों पर प्रकाश ड़ालती हुए कहती हैं,"ब्रिटेन में हिन्दी ',ब्रिटेन में हिन्दी बोली,भाषा और साहित्य तीनों पर बात करती है.इसके छ:अध्याय हैं १)ब्रिटेन में हिन्दी का उदभव और विकास,२)विकास में लगी संस्थाएँ ,३)भारतीयों के बीच हिन्दी,४)ब्रिटेन के हिन्दी लेखक और प्रवासी हिन्दी साहित्य,५)ब्रिटेन में बसे हिन्दी साहित्यकार और उनकी कृतियाँ,६)प्रवासी बच्चों के हिन्दी का पाठ्यक्रम I" जहाँ उषा राजे सक्सेना हिन्दी की दशा व दिशा के प्रश्न को उठाती हैं ,वहाँ ब्रिटेन में रहकर 'तेजेन्द्र शर्मा 'बाजारवाद से उपजे संघर्ष से जूझते जनमानस की मनोदशा का चित्रण करते हैं I उनका कहना है,"मैं हमेशा अपने आप को हारे हुए इंसान के साथ खड़ा पाता हूँ .ब्रिटेन में बसने के बाद मेरे साहित्य के विषयों में बदलाव आया है.आज मैं विदेशों में बसे भारतीयों की समस्याओं ,उपलब्धियों और संघर्ष की ओर अधिक ध्यान देता हूँ.मैं देखता हूँ कि मेरे चारों ओर जीवन अर्थ से संचालित है,रिश्तों में खोखलापन समा रहा है,बाजारवाद इंसान की सोच को अपने शिंकजे में कसता जा रहा है.पैदा होने से मृत्यु तक हम कैसे बाजार के नियमों तले दबे रहे हैं,ये सब मेरे साहित्य में परिलक्षित होता है I"
                         ऐसा माना जाता है कि अगर किसी भाषा का प्रचार-प्रसार करना हो तो उसका सबसे अच्छा माध्यम करना होता है Iएक शिक्षक अपनी भाषा में संस्कृति व सभ्यता को अपनाने की बात कहकर साहित्य के प्रति अगाध आस्था को प्रकट करता है I विदेशों में साहित्यकार लेखन-कार्य में अनवरत रत हैं,और साथ-साथ कई साहित्यकार वहाँ एक शिक्षक के रूप में भी विद्यालयों व विश्वविद्यालयों में भारतीय ही नहीं विदेशी विधार्थियों को शिक्षा देकर हिन्दी भाषा के सम्मान को और भी अधिक बढ़ा रहें हैं ,जिनमें सुषम बेदी व कृष्ण बिहारी  का नाम मुख्य रूप से जुड़ा है I अमेरिका की सुषम बेदी कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ाती हैं.अपने अनुभवों को बताते हुए वे कहती हैं,"अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़ा रहना मेरे लिए सहज था I मैं भारत में हिन्दी साहित्य की लेक्चरर थी,लिखती भी थी,वही काम और शौक जारी रखे.मुश्किल जरूर था I अक्सर फिजूल कर्म भी लगा लेकिन अंततः यही मेरे लिये सुखद और आत्मसंतोष देने वाला कर्म था,भाषा सिखाने में आंनद आता था .खासकर जब विधार्थी सीखकर भाषा के इस्तेमाल करने लगते हैं....खुशकिस्मत थी कि कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ाने का पद भी मिला.इस तरह शौक और काम दोनों का मकसद एक ही हो गया I"
                                 इसी तरह संयुक्त अरब इमारात में रहने वाले  'कृष्ण बिहारी  'भी लेखन के साथ-साथ अध्यापन करके हिन्दी भाषा को उन्नति की ओर अग्रसर कर रहें हैं,"बच्चों को विद्यालयों में हिन्दी पढ़ाता हूँ.भारतीय दूतावास और अपने कुछ मित्रों की सहायता से साल में एक-दो कार्यक्रम कराता हूँ.कुछ बच्चों को हिन्दी में अच्छा वक्ता बनने पर मेहनत करता हूँ I "
                                यह सत्य है कि पत्र-पत्रिकाएँ किसी भी भाषा की स्थिति में सुधारात्मक प्रयास करके उसे प्रगति के उच्च शिखर तक पहुँचाने में सक्षम होती है Iइसी सन्दर्भ में विदेशों में साहित्यकार हिन्दी पत्रिकाओं का संचालन सुरूचिपूर्वक कर रहें हैं I इन पत्रिकाओं में ई-पत्रिकाएँ(आनलाइन ) व मुद्रित रूप से भी सम्पादित की जा रही हैं I जिनमें ई-पत्रिकाओं (आनलाइन) में ' पूर्णिमा वर्मन 'की 'अनुभूति ' व 'अभिव्यक्ति ' अपनी  एक अलग पहचान बना चुकी हैं , और अन्य ई-पत्रिकाओं में शैल अग्रवाल की 'लेखनी ' व अमेरिका से 'ई-विश्वा 'भी ऐसी ही पत्रिकाएँ हैं जो तत्कालीन समाज का दर्शन करवाती है Iअमेरिका से ' शैल अग्रवाल ' ई-पत्रिका 'लेखनी ' के सन्दर्भ में बताती हैं,"लोकप्रियता इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है.आज तीन से चार लाख तक की मासिक हिट है.अब शुरुआत की थी  तो माह के अंत तक मात्र दस हजार हिट होती थी.इस पाँचवें वर्ष के प्रतिदिन करीब-करीब दस हजार हिट होती हैं.साहित्य और शैक्षिक संस्थाओं का ध्यान भी इसकी तरफ गया है और कुछ शिक्षण संस्थाओं ने इसे सन्दर्भ- कोष की तरह से भी इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है.साथ ही नए-पुराने एक ही सोच वाले देश-विदेश के कई अच्छे,लेखक और कवियों का पूर्ण रचनात्मक सहयोग मिला है,लेखनी को I " इस तरह अन्य ई-पत्रिकाओं और मुद्रित पत्रिकाओं में अमेरिका से विश्व-विवेक ,सौरभ व भारती ,इंग्लैंड से पुरवाई,कैनेडा से हिन्दी-चेतना,नार्वे में दर्पण ,शन्ति दूत,फीजी में लहर एवं संस्कृति ,मारीशस में मुक्ता,जनवाणी तथा सुमन ,सूरीनाम से सेतुबंध व यू.ए.ई से निकट आदि भी भारतीय संस्कृति व सभ्यता को कायम रखने के लिए हिन्दी-भाषा के प्रति अपना कर्तव्य को निष्ठापूर्वक निभाकर हिन्दी भाषा के भविष्य को उज्ज्वल एवं सुरभित कर रही हैं I
                               विदेश में हिन्दी के विकास  में जहाँ लेखन-कार्य ,अध्यापन व पत्र-पत्रिकाओं की अहम भूमिका है, वही हिन्दी भाषा को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसारित करने के लिए  छोटे स्तर से लेकर बड़े स्तर पर आयोजित विश्व हिन्दी सम्मेलन व गोष्ठियों आदि द्वारा आयोजित कार्यक्रमों का भी अप्रतिम योगदान मिल रहा है I वहाँ साहित्यकार निरन्तर अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर विविध कार्यक्रम करवाने में प्रयत्नशील हैं I संयुक्त अरब इमारात में रह रहीं लेखिका ' पूर्णिमा वर्मन 'बताती हैं," इमारात में हमारी एक छोटी-सी संस्था है ,शुक्रवार चौपाल के नाम से.जहाँ हम हर शुक्रवार की दोपहर मिलकर हिन्दी की कोई कहानी और नाटक या कविताएँ पढ़तें हैं.साल में तीन या चार नाटक भी करते हैं I" इसी तरह  ब्रिटेन से लेखिका 'दिव्या माथुर ' भी जानकारी देते हुए कहती हैं,"ब्रिटेन में  भारतीय संस्कृति और सभ्यता बड़े पैमाने पर चलता रहा है.भाषा और कला के शिक्षण के जरिए बच्चे अपने को भारत से जुड़ा पाते हैं.मंदिरों ,गुरुदवारों ,स्कूलों और कांउसिल की इमारतों में नियमित कक्षाएं ली जाती हैं.भारतीय विद्या भवन,नहेरू केन्द्र ,पाटीदार समाज जैसे पचासियों आयोजन-स्थल हैं,जहाँ भाषा और सँस्कृति को लेकर बड़े पैमानों पर कार्यक्रम होते रहतें हैं I" इन साहित्यकारों का साहित्य वहाँ के समाज का दर्पण दिखाता है I इनके साहित्य में सत्यम्,शिवम् व सुन्दरम् का वास भी है , तथा लोकमंगल की भावना भी .यू.के के वरिष्ठ गजलकार ' प्राण शर्मा 'का मन्तव्य भी यही है I उनके कथानुसार ,"मेरी दृष्टि में साहित्य वही जीवित रहता है जिसमें लोकमंगल की भावना हो,और जिसमें सत्यम् , शिवम् व सुन्दरम् की स्थापना की गई हो  I "
                                  निश्चित रूप से इन सभी साहित्यकारों ने विदेशी पृष्ठभूमि पर नवीन मूल्यों की स्थापना करके हिन्दी भाषा की दिशा व दशा में बदलाव तथा निखार लाकर उसके वैभव को सम्पोषित किया है I ब्रिटेन से ' उषा राजे सक्सेना ' कहती हैं," मैं ब्रिटेन में मई 1967 से हूँ.तुलनात्मक दृष्टि से देखूँ तो पहले की अपेक्षा आज ब्रिटेन में हिन्दी की स्थिति सम्मानजनक है I ब्रिटेन की भारतवंशी आज विभिन्न प्रकार से मातृभाषा के प्रति अपने प्रेम का प्रदर्शन कर रहें हैं I कोई लिखता है,कोई स्पर्धा कराता है,कोई सम्मेलन कराता है,कोई पढ़ाता है,कोई किताबें बेचता है I आज हिन्दी बोलने में लोगों को लज्जा नहीं आती.आपको बाजारों,दुकानों,अस्पतालों ,स्कूलों,विश्वविद्यालयों में लोग आपस में हिन्दी भी बोलते मिल जाएंगे.साँस्कृतिक कार्यक्रमों के सँचालन भी अब अक्सर हिन्दी में होने लगे हैं I
                                हिन्दी को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर एक अलग एवं सफल मंच पर विराजमान करने का श्रेय इन सभी विदेश में रह रहे हिन्दी भाषा के साहित्यकारों को जाता है I परिणामस्वरूप आज हिन्दी का विकास अन्य भारतीय भाषाओं की कीमत पर नहीं बल्कि उनके साथ हो रहा है, और यहाँ तक कि वह अँग्रेज़ी से प्रतिस्पर्धा न करके अपने सर्वांगीण विकास की ओर उन्मुख हो रही है I
लेखिका--- ड़ॉ  प्रीत अरोड़ा


Thursday, 21 June 2012

नव -चेतना

आओं मिलजुल कर जीवन खुशहाल बनाये
समस्याओ का निदान कर नवचेतना जगाये
यथार्थ के धरातल पर पैर जमाये
आत्म- सयंत कर स्वयं को मजबूत बनाये
आंतकवाद ,भ्रष्टाचार से लड़ समाज को स्वस्थ बनाये
गौतम गाँधी के मार्ग पर चलकर
मातृ-भूमि को स्वर्ग बनाये
दहेज़ प्रथा ,भ्रूण हत्या जैसी कुरीतियों को जड़ से मिटाएं
आज के बच्चे कल के नेताओं का
जीवन सफल बनाये
सादा जीवन उच्च विचार
ऐसा आदर्श अपनाये
सत्यम शिवम् सुन्दरम का पंचम लहराए
नव जागरण का गीत गाये
वैर -विरोध की भाषा भुलाकर
प्रेम प्यार का बिगुल बजाये
आओ मिल जुल कर जीवन खुशहाल बनाये

Monday, 7 May 2012

७ मई रविन्द्र नाथ टैगोर जी के जन्मदिन के उपलक्ष्य में


रविन्द्र नाथ टैगोर (रवीन्द्रनाथ ठाकुर, रोबिन्द्रोनाथ ठाकुर) (7 मई, 1861-7 अगस्त,1941) को गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता है। वे बंगला के विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार एवं दार्शनिक हैं.भारत का राष्ट्र.गान जन गण मन और बांग्लादेश का राष्ट्रीय गान आमार सोनार बांग्ला गुरुदेव की ही रचनाएँ हैं । वे साहित्य और समाज के युगदृष्टा,मार्गदर्शक व मसीहा बनें.टैगोर जी प्रकृति-प्रेमी थे प्रकृति के सान्निध्य में पेड़ों, बगीचों और एक लाइब्रेरी के साथ टैगोर जी ने शांतिनिकेतन की स्थापना की । तो आइए शांतिनिकेतन के बारे में और अधिक जानकारी लेने के लिए आज मुलाकात करते हैं लेखिका जेन्नी शबनम जी से,जिन्होंने अपने जीवन का कुछ समय शांतिनिकेतन में बिताया.प्रस्तुत  है जेन्नी शबनम   से  डा. प्रीत अरोड़ा की बातचीत ......

1. प्रश्न - जेन्नी जी, लेखन कार्य में आपकी रूचि कब पैदा हुई? आपने लिखना कब से शुरू किया?
उत्तर -
लेखन कार्य में रूचि तो शायद बचपन में ही जागृत हुई. मेरे पिता भागलपुर विश्वविद्द्यालय में प्रोफेसर थे और मेरी माँ इंटर स्कूल में प्राचार्या थी. घर में लिखने-पढ़ने का माहौल था, तो शायद इससे ही लिखने की प्रेरणा मिली. बी.ए. में थी तब से लिखना शुरू किया. परन्तु जो भी लिखा वो सब डायरी में छुपा रहा. 1995 में कुछ दैनिक अखबार में मेरे कुछ लेख प्रकाशित हुए थे. 2005 में इमरोज़ जी से मिलने गई तब पहली बार उनसे मैंने अपनी कविताओं का जिक्र किया और उन्होंने मुझे अपनी रचनाओं को सार्वजनिक करने के लिए कहा. 2006 में पहली बार मैंने अपनी कुछ रचनाएं सार्वजनिक की; उसके बाद ही घर में भी सभी ने जाना कि मैं कवितायें भी लिखती हूँ. बाद में 2008 में जब नेट की दुनिया से जुड़ी तब से मेरी कविताओं को विस्तार मिला.


2. प्रश्न - किन किन विधाओं में आप लिखती हैं?
उत्तर -
मुख्यतः मेरे लेखन का विषय सामाजिक है. चाहे वो काव्य-लेखन हो या आलेख. सामजिक विषमताओं जिनमें स्त्री-विमर्श, विशेष घटनाएं, संस्मरण, यात्रा वृत्तांत, मन में स्वतः उपजी भावनाएं आदि होती हैं. अधिकाँश कविताएँ अतुकांत और आज़ाद ख्याल की हैं. कुछ हाइकु और ताँका भी लिखे हैं.


3. प्रश्न - अब तक आपने कितनी रचनाओं का सृजन किया है? कौन कौन सी मुख्य रचनाएँ हैं? अपनी पसंद की कुछ रचनाओं का जिक्र करें. उत्तर -
रचनाएँ तो हज़ारों की संख्या में है परन्तु मेरे ब्लॉग http://lamhon-ka-safar.blogspot.in/ में अभी 340 कवितायें प्रेषित हैं जिनमें कुछ हाइकु और ताँका भी शामिल हैं. मेरे ब्लॉग http://saajha-sansaar.blogspot.in/ में अलग अलग विषय पर 35 लेख प्रेषित हैं. मेरी कुछ काव्य-रचनाएँ जो मुझे बेहद पसंद है, उनके शीर्षक हैं... फूल कुमारी उदास है, तेरे ख्यालों के साथ रहना है, परवाह, कवच, मैं स्त्री हो गई, जा तुझे इश्क हो, भूमिका, अकेले से लगे तुम, क्या बन सकोगे एक इमरोज़, मछली या समंदर, एक अदद रोटी, बेलौस नशा माँगती हूँ, उम्र कटी अब बीता सफ़र, अनुबंध, विजयी हो पुत्र, राम नाम सत्य है, हवा खून खून कहती है, तुम अपना ख्याल रखना, ये कैसी निशानी है, तुम शामिल हो, आज़ादी चाहती हूँ बदला नहीं, अज्ञात शून्यता, चाँद सितारे, बाबा आओ देखो... तुम्हारी बिटिया रोती है, कृष्ण एक नयी गीता लिखो, नेह-निमंत्रण तुम बिसरा गए, अवैध सम्बन्ध, ख़ुद को बचा लाई हूँ, आओ मेरे पास, आदि. लेख में 'लुप्त होते लोकगीत', 'चहारदीवारियों में चोखेरबालियाँ', 'राम जन्मभूमि : बाबरी मस्ज़िद', 'ईश्वर के होने न होने के बीच', 'टूटता भरोसा बिखरता इंसान', 'मोहल्ला मुख्यमंत्री', 'नाथनगर के अनाथ', 'रहस्यमय शरत', 'स्मृतियों से शान्तिनिकेतन', 'कठपुतलियों वाली श्यामली दी'', स्मृतियों में शान्तिनिकेतन' आदि.


4. प्रश्न - अपनी प्रकाशित रचनाओं के बारे में बताएँ.
उत्तर - डॉ. मिथिलेश दीक्षित द्वारा संपादित हाइकु-संकलन 'सदी के प्रथम दशक का हिन्दी हाइकु-काव्य' (सन् 2011) में 108 हाइकुकारों के हाइकु हैं जिनमें मेरे 12 हाइकु हैं. श्री राजेन्द्र मोहन त्रिवेदी 'बन्धु'  द्वारा संपादित हाइकु-संकलन 'सच बोलते शब्द' (सन् 2011, दिसम्बर) में अट्ठानवे हाइकुकारों के हाइकु हैं जिनमें मेरे 10 हाइकु हैं. श्री रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' और डॉ. भावना कुँवर द्वारा संपादित ताँका-संकलन 'भाव-कलश' (सन् 2012) में 29 कवियों के ताँका हैं जिनमें मेरे 30 ताँका हैं.
ऑस्ट्रेलिया की पत्रिका 'हिन्दी गौरव' तथा भारत की विभिन्न पत्रिका जैसे उदंती, सद्भावना दर्पण, वीणा, वस्त्र परिधान, गर्भनाल, प्राच्य प्रभा, वटवृक्ष, आरोह अवरोह में कविता और लेख का प्रकाशन. तहलका और लीगल मित्र पत्रिका में संयुक्त लेखन प्रकाशित.
चौथी दुनिया, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, भारत देश हमारा आदि अखबार में लेख प्रकाशित.  


5 . प्रश्न - गुरुदेव रबीन्द्रनाथ ठाकुर के बारे में आप पाठकों को कुछ बताएँ.
उत्तर -
गुरुदेव रबीन्द्रनाथ ठाकुर विश्वविख्यात कवि राष्ट्र-कवि के रूप में जाने जाते हैं. वो भारत की आज़ादी की लड़ाई से भी जुड़े हुए थे. गुरुदेव बहुत बड़े साहित्यकार, कहानीकार, कवि, चित्रकार, गीतकार, संगीतकार, नाटककार, निबंधकार, दार्शनिक और समाज सेवी थे. उन्हें साहित्य के लिए नोबेल प्राइज़ मिला था. उनकी रचनाओं में प्रकृति और आम मनुष्य की गहरी संवेदनाएं परिलक्षित होती हैं. गुरुदेव द्वारा रचित ''जन गण मन अधिनायक जय है'' भारत का राष्ट्र-गान बना तथा ''आमार सोनार बांग्ला'' बांग्ला देश का राष्ट्र-गान बना. गुरु देव द्वारा रचित गीत और संगीत 'रबीन्द्र संगीत' के नाम से प्रसिद्ध है. जालियाँवाला बाग़ काण्ड के विरोध में गुरुदेव ने ब्रिटिश द्वरा मिला खिताब 'सर' लौटा दिया साथ ही नाईटहुड की उपाधि भी लौटा दी.


6. प्रश्न - शान्तिनिकेतन के बारे में बताएँ.
उत्तर -
गुरुदेव रबीन्द्रनाथ ठाकुर की कर्मभूमि 'शान्तिनिकेतन' की स्थापना गुरुदेव के पिता महर्षि देबेन्द्रनाथ ठाकुर ने पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिला के बोलपुर में की. यहाँ गुरुदेव ने भारतीय और पाश्चात्य देश की सर्वश्रेष्ठ परंपरा को सम्मिलित कर एक नया प्रयोग किया और अपनी सोच पर आधारित विद्यालय खोला जो बाद में विश्वभारती विश्वविद्यालय के नाम से प्रसिद्द हुआ. यह स्थान प्रकृति के साथ कला, साहित्य और संस्कृति का अनोखा संगम है. गुरुदेव की सोच और जीवन-शैली यहाँ की संस्कृति में रचा बसा हुआ है. सहज जीवन के साथ चिंतन का समावेश यहाँ दिखता है. शान्तिनिकेतन शिक्षा के साथ ही पर्यटन के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है.


7. प्रश्न - सुनने में आया है कि आपके जीवन की कोई घटना शान्तिनिकेतन से सम्बन्ध रखती है; कृपया उस पर प्रकाश डालें.
उत्तर -
भागलपुर दंगा जीवन की ऐसी घटना थी जिसने मेरे जीवन की दशा और दिशा बदल दी. 1989 में भागलपुर में साम्प्रदायिक दंगा हुआ था, जिसमें मेरे घर में पनाह लिए करीब 100 लोगों में से 22 लोग क़त्ल कर दिए गए. 1990 में पश्चिम बंगाल से गौर किशोर घोष जो आनंद बाज़ार पत्रिका से सम्बद्ध थे; शान्तिनिकेतन से कुछ लोगों की टीम लेकर सामाजिक सद्भावना के लिए भागलपुर आए. मेरे घर में हुई घटना से मेरी मानसिक स्थिति का अंदाजा लगाते हुए अपने साथ शान्तिनिकेतन ले गए. इस तरह भागलपुर दंगा की दुखद घटना के बाद मेरा शान्तिनिकेतन से सम्बन्ध जुड़ गया.


8. प्रश्न - जेन्नी जी, शान्तिनिकेतन से आपका लगाव कब और कैसे हुआ?
उत्तर -
1990 में शान्तिनिकेतन पहली बार आई थी. जब यहाँ आई तो सभी अपरिचित थे. गौर दा और उनकी टीम के सदस्यों ने मेरा बहुत सहयोग किया ताकि मैं उस घटना के प्रभाव से उबर सकूँ. जब शान्तिनिकेतन आई थी तब तक मेरी मेरी एम. ए. की परिक्षा ख़त्म हो गई थी और मैंने एल.एल बी. भी कर लिया था. पढ़ाई ख़त्म हो चुकी थी और भागलपुर के घर में जाने से मन घबराता था तो गौर दा ने विश्वभारती विश्वविद्यालय में मेरा नामांकन करा दिया. शान्तिनिकेतन से अपरिचित मैं धीरे धीरे वहाँ के शांत वातावरण और अपनापन वाले माहौल में रच बस गई. वहाँ सभी से मुझे बहुत प्रेम और अपनापन मिला और वहाँ का वातावरण मेरे मन के अनुकूल लगा, इस कारण शान्तिनिकेतन से लगाव हुआ.


9. प्रश्न - वहाँ का वातावरण आपको कैसा लगा?
उत्तर -
शान्तिनिकेतन नाम से ही वहाँ के वातावरण का सहज अंदाज़ा लगाया जा सकता है. बहुत ही शांत और प्राकृतिक वातावरण जहाँ शिक्षा के साथ ही भारतीय कला और संस्कृति की अनुगूँज हर तरफ दिखती है. वहाँ का वातावरण बहुत सहज और सरल है जो मन को सुकून देता है और मुझे मेरी जीवन शैली और सोच के करीब लगता है.


10. प्रश्न- आपने शान्तिनिकेतन में कितना समय गुजारा?
उत्तर -
तकरीबन 6 माह मैं शान्तिनिकेतन में रही.


11. प्रश्न - शान्तिनिकेतन में रहते हुए किन-किन महानुभावों से आपका सम्पर्क हुआ?
उत्तर -
शान्तिनिकेतन में रहते हुए कई सम्मानिये लोगों से सम्पर्क हुआ जिनमें विश्वभारती विश्वविद्यालय के तात्कालीन कुलपति, कलाकार, लेखक, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता आदि शामिल हैं. गौर किशोर घोष, श्यामली खस्तगीर, बानी सिन्हा, सुरेश खैरनार, अमलान दत्त, आरती सेन, मंजूरानी सिंह, श्यामा कुंडू, रमा कुंडू, मनीषा बनर्जी आदि लोगों से मुलाक़ात हुई. 


12. प्रश्न-  क्या आज भी आप वहाँ जाती हैं?
उत्तर -
जी हाँ. 20 वर्ष पूर्व शान्तिनिकेतन छोड़ कर आई थी उसके बाद अभी गत वर्ष दो बार वहाँ गई.


13. प्रश्न - आपके जीवन की कुछ अविस्मरणीय घटना?
उत्तर -
यूँ तो जीवन में सदा अप्रत्याशित घटनाएँ होती रहती हैं, कुछ सुखद कुछ दुखद. 1978 में मेरे पिता की मृत्यु मेरे लिए बहुत दुखद घटना थी. उसके बाद 1989 में भागलपुर का दंगा ऐसी ही दुखद घटना है जिसे जीवन भर भूल नहीं सकती. एक और घटना का जिक्र करना चाहूंगी जिसे सुखद कहूँ या दुखद मैं ख़ुद समझ नहीं पाती. दोबारा शान्तिनिकेतन जाने पर पुराने सभी मित्रों और परिचितों से मिलना बहुत सुखद रहा था. श्यामली दी जो एक सामाजिक कार्यकर्ता के साथ ही लोककला और संस्कृति के प्रसार के लिए प्रसिद्ध हैं; से मिलने के बाद 18 जुलाई, 2011 को मैं वापस आ रही थी. उन्होंने मुझे नाश्ते पर बुलाया था, नाश्ता बनाते हुए उन्हें स्ट्रोक आया और मुझसे बातें करते करते में उनका पूरा शरीर लकवाग्रस्त हो गया. अस्पताल में भर्ती हुई और फिर 15 अगस्त को सदा के लिए चली गईं. 20 साल बाद श्यामली दी से मेरी मुलाक़ात और फिर मुझसे ही अंतिम बात हुई और दुनिया छोड़ गई, समझ नहीं पाती कि ऐसा क्यों हुआ. शान्तिनिकेतन में गौर दा के बाद श्यामली दी से मैं बहुत जुड़ी हुई थी.


14. प्रश्न - शान्तिनिकेतन पर क्या आपने कभी कुछ लिखा है? कोई रचना जिसे हम सभी से साझा करना चाहेंगी?
उत्तर -
शान्तिनिकेतन पर मेरे लेख और संस्मरण हैं - 'स्मृतियों से शान्तिनिकेतन', 'स्मृतियों में शान्तिनिकेतन' और 'कठपुतलियों वाली श्यामली दी' आदि.
जब 20 साल बाद दोबारा शान्तिनिकेतन गई तो शान्तिनिकेतन पर एक कविता लिखी, जिसे आप सभी से साझा कर रही हूँ.


उन्हीं दिनों की तरह...
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चौंक कर उसने कहा
''जाओ लौट जाओ
क्यों आयी हो यहाँ
क्या सिर्फ वक़्त बिताना चाहती हो यहाँ?
हमने तो सर्वस्व अपनाया था तुम्हें
क्यों छोड़ गई थी हमें?''
मैं अवाक
निरुत्तर!
फिर भी कह उठी
उस समय भी कहाँ मेरी मर्ज़ी चली थी
गवाह तो थे न तुम,
जीवन की दशा और दिशा को
तुमने हीं तो बदला था,
सब जानते तो थे तुम
तब भी और अब भी|
सच है
तुम भी बदल गए हो
वो न रहे
जैसा उन दिनों छोड़ गई थी मैं,
एक भूल भुलैया
या फिर अपरिचित सी फ़िज़ा
जाने क्यों लग रही है मुझे|
तुम न समझो
पर अपना सा लग रहा है मुझे
थोड़ा थोड़ा हीं सही,
आस है
शायद
तुम वापस अपना लो मुझे
उसी चिर परिचित अपनेपन के साथ
जब मैं पहली बार मिली थी तुमसे,
और तुमने बेझिझक
सहारा दिया था मुझे
ये जानते हुए कि मैं असमर्थ और निर्भर हूँ
और हमेशा रहूंगी,
तुमने मेरी समस्त दुश्वारियां समेट ली थी
और मैं बेफ़िक्र
ज़िन्दगी के नए रूप देख रही थी
सही मायने में ज़िन्दगी जी रही थी|
सब कुछ बदल गया है
वक़्त के साथ,
जानती हूँ
पर उन यादों को जी तो सकती हूँ|
ज़रा-ज़रा पहचानो मुझे
एक बार फिर उसी दौर से गुज़र रही हूँ,
फ़र्क सिर्फ वज़ह का है
एक बार फिर मेरी ज़िन्दगी तटस्थ हो चली है
मैं असमर्थ और निर्भर हो चली हूँ|
तनिक सुकून दे दो
फिर लौट जाना है मुझे
उसी तरह उस गुमनाम दुनिया में
जिस तरह एक बार ले जाई गई थी
तुमसे दूर
जहाँ अपनी समस्त पहचान खोकर भी
अब तक जीवित हूँ|
मत कहो
''जाओ लौट जाओ'',
एक बार कह दो
''शब, तुम वही हो
मैं भी वही
फिर आना
कुछ वक़्त निकालकर
एक बार साथ साथ जियेंगे
फिर से
उन्हीं दिनों की तरह
कुछ पल!''

_ जेन्नी शबनम ( जुलाई 17, 2011)
( 20 साल बाद शान्तिनिकेतन आने पर )
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15. प्रश्न- आप हमारे युवा वर्ग को क्या सन्देश देना चाहेंगी?
उत्तर -
युवा वर्ग के लिए मेरा यही सन्देश है कि उचित अनुचित की मान्य परिभाषा से अलग होकर अपनी सोच विकसित करें और ख़ुद अपनी राह का चुनाव करें. मुमकिन है ख़ुद की चुनी हुई राह में मुश्किलें हों; जीत मिले या कि मात हो, पर मन को सुकून तो होगा कि हमने कोशिश तो की. दूसरों के दिखाए राह पर चलना सरल भी है और सफल होने की पूर्ण संभावना भी परन्तु अनजान राहों पर चलकर सफल होना आत्म विश्वास भी बढ़ाता है और ख़ुद पर यकीन भी. बुजुर्गों की सुनो और समझो फिर अपने अनुभव से जिओ.   




७ मई रविन्द्र नाथ टैगोर जी के जन्मदिन के उपलक्ष्य में